प्राचीन भारतीय संस्कृति में गुरुकुल की शिक्षा पद्धति का विशेष स्थान रहा है । गुरुकुल एक ऐसा विद्यालय है जहां विद्यार्थी अपने परिवार से दूर गुरु के परिवार का हिस्सा बनकर शिक्षा ग्रहण करता है । भारत के प्राचीन इतिहास से लेकर आज तक ऐसे विद्यालयों का बहुत महत्व रहा है । गुरुकुल में विद्यार्थी ना केवल शारीरिक व मानसिक रूप से उन्नति करता है अपितु बौद्धिक व आध्यात्मिक रूप से भी वह प्रकृष्ट बुद्धि को प्राप्त करता है । एक चरित्रवान, संस्कारवान, मातृ - पितृ – गुरूभक्त व राष्ट्र भक्त व्यक्तित्व से सम्पन्न नागरिक ही हमारे समाज को उचित मार्गदर्शन देते हुए बहुविध उन्नति का साधक होता है । गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति ही छात्रों को सर्वे भवंन्तु सुखिनः का पाठ पढ़ते हुए सभी के लिए मंगलमय कामना करने का संदेश देती है । उपनिषदों में लिखा गया है कि मातृ देवो भव । पितृ देवो भव । आचार्य देवो भव । अतिथि देवो भाव । अर्थात् माता-पिता, गुरु और अतिथि संसार में यह चार प्रत्यक्ष देव हैं । इनकी सेवा सदैव करनी चाहिए । मनुस्मृति में मनु महाराज ने कहा है कि प्रत्येक को अपनी संतान के उज्जवल भविष्य निर्माण हेतु गुरुकुल में अध्ययनार्थ अवश्य भेजना चाहिए । गुरुकुल की प्राचीन शिक्षा परंपरा हमें बताती है कि देश में शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था कितनी श्रेष्ठ थी, जहाँ शिक्षा पूर्ण हो जाने पर गुरु शिष्य की परीक्षा लेते थे, शिष्य अपने सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देते, किन्तु निर्धन विद्यार्थी इससे मुक्त कर दिए जाते थे और समावर्तन संस्कार संपन्न कर उसे अपने परिवार में भेज दिया था । इसी क्रम में गुरुकुल करतारपुर निःशुल्क विद्या का सतत् प्रवाह निरंतर ज्ञानबद्ध धारा के साथ करता आ रहा है । मैं सत्र 2020 2021 में प्रवेश लेने वाले सभी विद्यार्थियों को उनके उज्जवल भविष्य हेतु शुभाशीष देता हूँ और यह आशा करता हूँ कि गुरुकुल शिक्षा पद्धति से शिक्षा प्रप्त कर प्रत्येक छात्र आर्य राष्ट्र निर्माण से अपनी भावी भूमिकाओं को उत्तम रीति से सम्पन्न करेगा ।


पुनः पुनः शुभाशीष ।

अध्यक्ष

ध्रुव कुमार मित्तल

गुरु विरजानन्द स्मारक समिति ट्रस्ट,

करतारपुर-144801 जिला-जालन्धर (पंजाब)